एब्डोमिनल कैंसर डे : विशेषज्ञों ने भारतीय जरूरतों के अनुरूप स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल की आवश्यकता बताई

May 21, 2026 - 17:27
May 21, 2026 - 17:30
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एब्डोमिनल कैंसर डे : विशेषज्ञों ने भारतीय जरूरतों के अनुरूप स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल की आवश्यकता बताई
एब्डोमिनल कैंसर डे : विशेषज्ञों ने भारतीय जरूरतों के अनुरूप स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल की आवश्यकता बताई

जयपुर: एब्डोमिनल कैंसर डे के अवसर पर विशेषज्ञों ने भारतीय आबादी के अनुरूप कैंसर स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। मंगलवार को जयपुर में आयोजित प्रिवेंटिव जीआई ऑन्कोलॉजी के वैज्ञानिक कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में लगभग 70 प्रतिशत एब्डोमिनल कैंसर के मामले एडवांस स्टेज में सामने आते हैं, जबकि समय पर स्क्रीनिंग के माध्यम से इनकी शुरुआती पहचान कर मरीजों की जान बचाई जा सकती है। यह वैज्ञानिक कार्यक्रम एब्डोमिनल कैंसर डे के अवसर पर आयोजित किया गया।

एब्डोमिनल कैंसर के प्रति जागरूकता की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए डॉ. संदीप जैन ने कहा, “गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल कैंसर के मामलों में ‘पेशेंट इंटरवल’ काफी अधिक होता है, यानी मरीज द्वारा लक्षण महसूस करने और डॉक्टर से परामर्श लेने के बीच लंबा अंतराल रहता है। यह देरी मरीज के लिए जोखिम बढ़ा देती है, इसलिए इस विषय में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।”

फोर्टिस हॉस्पिटल के डायरेक्टर एवं हेड, गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी डॉ. एस.एस. शर्मा ने कहा, “जहां शुरुआती पहचान होने पर कैंसर मरीजों की सर्वाइवल रेट 85-90 प्रतिशत तक होती है, वहीं देर से पहचान होने पर यह घटकर केवल 10-15 प्रतिशत रह जाती है। आंकड़े बताते हैं कि स्क्रीनिंग और गुणवत्ता जांच का शुरुआती पहचान में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, इसलिए जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है।”

फोर्टिस हॉस्पिटल के डॉ. मनीष अग्रवाल ने कहा, “लोगों में जागरूकता बढ़ाकर एब्डोमिनल कैंसर की शुरुआती अवस्था में पहचान सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।”

इस श्रेणी में इसोफेगस, लिवर, पैंक्रियाज, गॉलब्लैडर, गैस्ट्रिक कैंसर, अपेंडिक्स, कोलन और रेक्टम से जुड़े सात प्रकार के कैंसर शामिल हैं। इनमें से अधिकांश कैंसर लंबे समय तक बिना लक्षण के रहते हैं, जिससे लाखों लोगों की जान को खतरा बढ़ जाता है।

इसी उद्देश्य से हर वर्ष 19 मई को एब्डोमिनल कैंसर डे मनाया जाता है, जबकि विश्व कैंसर दिवस 4 फरवरी को मनाया जाता है। डॉ. संदीप जैन ने वर्ष 2019 में एब्डोमिनल कैंसर डे की शुरुआत की थी, जिसे अब भारत के विभिन्न शहरों सहित 12 देशों में मनाया जाता है। जयपुर में आयोजित यह पैनल डिस्कशन इसी श्रृंखला का हिस्सा था।

कार्यक्रम में प्रख्यात चिकित्सकों और विशेषज्ञों के साथ राजस्थान राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. अरुण चतुर्वेदी एवं संस्कृति युवा संस्था के अध्यक्ष पंडित सुरेश मिश्रा सहित कई सामाजिक हस्तियां भी उपस्थित रहे।

सभा को संबोधित करते हुए राजस्थान राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. अरुण चतुर्वेदी ने कहा, “कैंसर के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। ऐसे में डॉ. संदीप जैन द्वारा शुरू की गई यह पहल सराहनीय है। जागरूकता ही रोकथाम और समय पर उपचार की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है और ऐसे कार्यक्रम लोगों की जान बचाने में मदद करेंगे।”

संस्कृति युवा संस्था के अध्यक्ष पंडित सुरेश मिश्रा ने भी सामूहिक प्रयास की भावना को दोहराते हुए कहा, “हम जागरूकता फैलाने और लोगों की जान बचाने के इस अभियान में अपना समर्थन देने के लिए यहां मौजूद हैं।”

यह आयोजन एब्डोमिनल कैंसर ट्रस्ट द्वारा फोर्टिस हॉस्पिटल और IIEMR के सहयोग से किया गया। IIEMR के निदेशक मुकेश मिश्रा ने बताया कि एब्डोमिनल कैंसर डे के अवसर पर विभिन्न शहरों में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। जयपुर में पैनल डिस्कशन होटल हॉलिडे इन में आयोजित हुआ। विभिन्न सत्रों में विशेषज्ञों ने उपचार की नई तकनीकों, मानव व्यवहार से जुड़े पहलुओं और भारतीय परिदृश्य की विशिष्ट चुनौतियों पर चर्चा की।

सभा में सर्वसम्मति से यह माना गया कि शुरुआती पहचान से मरीजों के जीवित रहने की संभावना काफी बढ़ जाती है और प्रिवेंटिव स्क्रीनिंग लाखों लोगों की जान बचा सकती है। हालांकि भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप अभी तक इस बीमारी के लिए कोई मानक स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल उपलब्ध नहीं है।

इस विषय पर  डॉ आर के जेनॉ, डॉ. पंकज श्रीमल, प्रोफ वी के कपूर, डॉ. जीतेन्द्र चावला, डॉ. आर भोजवानी, डॉ राम डागा, डॉ. सुरेंद्र सुल्तानिआ, डॉ. सुधीर महऋषि, डॉ. सौरभ कालिया, डॉ. मुकेश कल्ला, डॉ. शालू गुप्ता, डॉ. जया माहेश्वरी, डॉ. एस निजहावन, डॉ. आर पोखरना, डॉ. जयंत शर्मा, प्रोफ वी ए  सारस्वत,  डॉ. मोनिका गुप्ता, डॉ. निमेष मेहता, डॉ. दिनेश भारती सहित कई प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने विस्तार से चर्चा की।

विशेषज्ञों ने जहां व्यापक स्तर पर स्क्रीनिंग की आवश्यकता पर जोर दिया, वहीं देश की विशाल जनसंख्या और इससे जुड़ी लागत को भी ध्यान में रखा। उन्होंने सुझाव दिया कि स्क्रीनिंग के लिए लोगों को हाई, मॉडरेट और लो-रिस्क श्रेणियों में विभाजित किया जाए। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि भारत में विशेष रूप से 25 से 40 वर्ष आयु वर्ग में ऐसे कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, इसलिए स्क्रीनिंग प्रयासों को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

Jay Choudhary News Writer | 3 Years Experience | Jaipur Special | All Latest News